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संपादकीय

जब गुंडे ही पुलिसवाले बनें हों

     अब इस बात की पहचान करना मुश्किल हो गया है कि जो पुलिस लोगों की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरी है वह वास्तव में पुलिस है भी या गुंडे पुलिस की वर्दी में आ गए हैं। पहले यह बातें कहानियों और फिल्मों में दिखाई जाती थीं। लेकिन अब यह बातें साफ तौर पर सामने आने लगी हैं कि गुंडे और पुलिसवाले मिलकर निर्दोष जनता को पीटने निकल पड़ते हैं। जंतर मंतर में पुलिस का जो तथाकथित आपराधिक रूप सामने आया है वह देशवासियों को भयभीत करने वाला है। खबर तो यह है कि प्रदर्शनकारी छात्रों को पीटने के लिए पुलिस अपने बीच संगीन मामलों में पकड़े गए कैदियों को लेकर आई थी। इस आरोप पर फिलहाल जांच चल रही है।
     ऐसा पहली बार ही नहीं सुनने को मिल रहा है। कुछ वर्ष पहले दिल्ली में युनिवर्सिटी के छात्रों को पीटने के लिए भी कुछ गुंडे पुलिस की वर्दी और उनके लट्ठ उठाकर लाए थे। तब भी होस्टल के छात्रों ने यह आरोप लगाए थे कि गुंडों को पुलिस का संरक्षण प्राप्त था और वह हॉस्टल में घुसकर छात्रों से मारपीट कर रहे थे। तब इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया था लेकिन अब जिस प्रकार की खबरें जंतर मंतर में 20 जुलाई को हुए जेन-जी छात्रों के प्रदर्शन के दौरान की सामने आ रही हैं, उसमें बताया जा रहा है कि पुलिस दल में बहुत से लोग पुलिस की आधी अधूरी वर्दी में तो थे लेकिन उनकी वर्दी में नेम प्लेट नहीं थी और वह भी पुलिस बल के साथ लाठीजार्च कर रहे थे।
     यह बात सिर्फ जांच के ही काबिल नहीं है बल्कि कड़ी सजा देने के लिए भी बहुत कम है। क्योंकि ये गुंडे छात्रों को घायल करने के लिए लाठियों में कीलें लगाकर लाए हुए थे। अब यह बात भी किसी से छुपी हुई नहीं है कि बिना सरकारी स्वीकृति के गुंडे पुलिस दल के बीच छुस नहीं सकते थे। यदि यह बात गलत है तो फिर विडियो फुटेज में आए इन गुंडों का इलाज पहले पुलिस ने क्यों नहीं किया। फील्ड में पुलिस दल का नेतृत्व करने वाले आफिसरों के खिलाफ न्यायिक जांच करके ऐसे अफसरों को नौकरियों से बर्खास्त किया जाना चाहिए। यह शूबा भी सभी लोगों को है कि दिल्ली पुलिस उन अधिकारियों के खिलाफ कोई कर्यवाही नहीं करेगी जिनकी मदद से ये गुंडे पुलिस दल के बीच शामिल हो गए थे।
     इस प्रकार की घठनाएं लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। पुलिस का रोल न्यायिक व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण है। यदि पुलिस ही गुंडों की तरह नजर आने लगेगी को नागरिक सुरक्षा के तो मायने ही बदल जाएंगे। इस बात की जांच गृहमंत्रालय या पुलिस के बड़े अधिकारियों के बस की बात नहीं है। इस बात के लिए तो कम से कम सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई निष्पक्ष टीम को जिम्मेदरी सौंपी जानी चाहिए। क्योंकि यह साधारण अपराध का मामला नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र में आम नागरिक की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। यदि इसे गंभीरता से न लिया गया तो कानून और संविधान आम नागरिक की सुरक्षा से वंचित हो जाएगा। गुंडे लोग पुलिस से मिलकर देश और संविधान को हांकने लगेंगे।

 
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