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लावारिस पशुओं और
कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला
कोर्ट ने कहा नागरिकों का मौलिक
अधिकार बचेगा...
शहर और कस्बों में झुंडों में घूमने वाले लाचारिस
पशुओं खासकर कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुना दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में देश भर की स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि हर
शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, सार्वजनिक खेल परिसर, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन
जैसे सार्वजनिक स्थलों से लावारिस कुत्तों को हटाने और उनके प्रवेश को रोकने के
लिए उचित बाड़ लगानी होगी। शीर्ष कोर्ट ने कड़ाई से कहा है कि इस संबंध में किसी
भी चूक को गंभीरता से लिया जाएगा और नगरपालिका व प्रशासनिक अधिकारियों को
जिम्मेदार ठहराया जाएगा। हलांकि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को कुछ पशु प्रेमियों
ने बहुत कड़ा निर्णय बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बेजुबान पशुओं की पीड़ा
को दरकिनार कर दिया है।
शीर्ष अदालत ने सड़कों, राजमार्गों व एक्सप्रेस-वे से लावारिस मवेशियों को भी
तत्काल हटाने के निर्देश दिए। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस
एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, खेल परिसर, बस
स्टैंड-डिपो या रेलवे स्टेशन के परिसर में पाए जाने वाले हर लावारिस कुत्ते को
तुरंत हटाना और उचित नसबंदी व टीकाकरण के न बाद निर्दिष्ट आश्रय स्थल में
स्थानांतरित करना संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले नगर निकाय प्राधिकरण की
जिम्मेदारी होगी।
रेबीज से बच्चे-बुजुर्ग व कमजोर वर्ग सर्वाधिक प्रभावित पीठ ने कहा कि विश्व
स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी)
सहित अन्य वैज्ञानिक आकलनों से यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में प्रतिवर्ष
पशुओं से संबंधित मौतों का बड़ा हिस्सा रेबीज के कारण होता है। 90 प्रतिशत से
अधिक लोगों की मौतें घरेलू या लावारिस कुत्तों के काटने के कारण होते हैं। इस
खतरे का खामियाजा बच्चों, बुजुर्गों व आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को भुगतना पड़
रहा है जो असुरक्षित होने के अलावा समय पर इलाज नहीं पा सकते।
यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों, विशेषकर बच्चों, रोगियों व
खिलाड़ियों के जीवन और सुरक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए जरूरी है। पीठ
ने कहा, इस आदेश का प्राथमिक मकसद नागरिकों, विशेषकर बच्चों, छात्रों, रोगियों
और खिलाड़ियों के जीवन व सुरक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा करना है। साथ ही,
इसका मकसद पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत बनाए गए पशु जन्म नियंत्रण
नियम, 2023 में निहित सिद्धांतों का अनुपालन सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने कहा कि इस आदेश का पालन नहीं किया तो मुख्य सचिव जिम्मेदार होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि सभी राज्य व केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य
सचिव आदेश का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करेंगे। अन्यथा वह अधिकारी व्यक्तिगत रूप
से जिम्मेदार ठहराए जाएंगे। कोर्ट ने निर्देशों का पालन करने के लिए विकसित
तंत्र का संकेत देते हुए आठ सप्ताह में स्थिति रिपोर्ट पेश करने का का निर्देश
दिया है। सुनवाई की अगली तारीख 13 जनवरी, 2026 निर्धारित की गई है। कोर्ट ने
आदेश दिया कि इन क्षेत्रों से उठाए गए कुत्तों को उसी स्थान पर नहीं छोड़ा जाना
चाहिए, जहां से उन्हें उठाया गया था।
ऐसा करने की अनुमति देने से ऐसे संस्थानों को कुत्तों से मुक्त करने का मकसद ही
विफल हो जाएगा। पीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कुत्तों के मामले में यह आदेश
पारित किया। पीठ ने कहा, स्थानीय निकायों को यह सुनिश्चित करने के लिए समय-समय
पर निरीक्षण करना चाहिए कि ऐसे परिसरों में कुत्तों का कोई निवास न हो। कम से
कम तीन महीने में एक बार निरीक्षण अवश्य किया जाना चाहिए।
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