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भारत में करोड़ों
युवाओं को मानसिक रोगी बना दिया है
नौकरी, परिवार और करियर युवाओं
के लिए चिंता...
भारत में चल रही परेशानियों ने करोड़ों युवाओं को
मानसिक रोगी बनाकर रख दिया है। जिस प्रकार की खबरें युवाओं को सोशल मीडिया,
अखबारों और अन्य साधनों से मिल रही हैं, उससे देश का युवा परेशानी के गर्त में
धंसा जा रहा है। सरकार की कार्य प्रणाली, देश में फैल रहा धार्मिक आडंबर और देश
में मौजूद न्यायिक व्यवस्था युवाओं को आगे जीवन जीने के लिए कष्टदायी महसूस होने
लगी है। युवाओं की समसे बड़ी चिंता यह है कि वह इन परिस्थितियों में कैसे एक
सभ्य नारिक का जीवन जी पाएंगे।
समस्या इतनी विकट है कि युवाओं में मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। जो इस
बात को साबित करने के लिए काफी है कि भारत में युवा वर्ग काफी परेशान है। एक
आंकड़े के मुताबिक करीब 5.4 करोड़ और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में 2.8 करोड़
से ज्यादा युवा किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना
है कि अगर इस ओर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में इसका असर
न सिर्फ युवाओं के स्वास्थ्य, बल्कि शिक्षा, युवाओं की सुरक्षा, रोजगार और देश
की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
ईयू-एशियन यूथ मेंटल हेल्थ कॉन्फ्रेंस ने भी हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट
में बताया है कि पिछले तीन दशकों में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में युवाओं के
मानसिक रोग के मामलों में 44 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है और 15 वर्ष से 34 वर्ष
के आयु वर्ग के 2.8 करोड़ से अधिक युवा मानसिक रोगियों की तरह जीवन जीने को
मजबूर हैं। जबकि यह अवस्था उनकी उच्च शिक्षा प्राप्त करने, स्वस्थ बने रहने और
भविष्य को संवाने के लिए मेहनत करने पर केन्द्रित रहनी चाहिए।
इसी प्रकाशित रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में 15 से 24 वर्ष की आयु
वर्ग के ही लगभग 5.4 करोड़ युवा किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं।
विशेषज्ञ इस बात को भी मानते हैं कि इस उम्र में मानसिक दबाव का असर पढ़ाई, नौकरी,
रिश्तों और भविष्य के फैसलों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। पिछले तीन दशकों में सबसे
तेज 25-34 वर्ष आयु वर्ग में यह मानसिक विकार फैला है। यानी नौकरी, परिवार और
करियर की जिम्मेदारियों वाली इस उम्र में युवा सबसे अधिक प्रभावित हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि युवाओं में चिंता (एंग्जायटी) सबसे आम मानसिक समस्या
बनकर उभरी है। हर 100 युवाओं में लगभग पांच इससे प्रभावित हैं।
इसके बाद अवसाद, नशे की लत और अन्य मानसिक विकारों के मामले भी तेजी से बढ़ रहे
हैं। कहा जा सकता है कि बहुत से युवा अपने मानसिक संतुलन पर नियंत्रण नहीं रख
पा रहे हैं। महिलाओं में मानसिक बीमारियों के मामले पुरुषों की तुलना में अधिक
पाए गए हैं। इसका कारण इन समस्याओं के रहते उनका भविष्य और सामाजिक तानाबाना भी
है। महिलाओं की जीवनशैली जिस प्रकार से भारत वर्ष में ढाली जाती है उसमें यह
मानसिक दबाव भी कई गुणा बढ़ जाता है।
पढ़ाई व करियर की प्रतिस्पर्धा, नौकरी की अनिश्चितता, आर्थिक दबाव तो तनाव के
कारण थे ही अब सोशल मीडिया, अकेलापन, प्राकृतिक आपदाएं व सामाजिक तनाव युवाओं
के मानसिक स्वास्थ्य को और अधिक प्रभावित कर रहे हैं। लोग आज भी मानसिक बीमारी
को छिपाते हैं जिससे समय पर इसका इलाज नहीं मिल पाता। रिपोर्ट में कहा गया है
कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय स्कूलों,
कॉलेजों व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना होगा।
इसका समस्या का हल काफी पेचीदा है क्योंकि जो काम सरकार को करना चाहिए वह सरकारें
नहीं कर पा रही हैं। लेकिन सरकार इस तरह की काउंसिलिंग स्कूल स्तर तो शुरू करवा
सकती है ताकि युवा मौजूदा समस्याओं के बीच अपने आपको ढालकर उससे आने वाली
विकृतियों का सामना करने के काबिल तो बन सकें और उसके मन में नशा या अपराध जैसे
विकार उसके मन में आते हैं उससे वह दूर रह सके।युवाओं की समस्याओं को गंभीरता
से लेना चाहिए।
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