क्या हिमाचल
के बागी नेता फिर बनाएंगे तीसरा मोर्चा
विजनरी नेता
नहीं हैं तीसरी पार्टी बनाने वाले...
विशेष संवाददाता
शिमला : क्या हिमाचल प्रदेश में बागी नेता फिर से कोई तीसरा मोर्चा बनाकर चुनाव
मैदान में उतरेंगे। भाजपा की तरफ देखा जाए तो पार्टी के कुछ नेताओं ने अपने
बगावती तेवर पार्टी आलाकमान को दिखाने शुरू कर दिए हैं। कांग्रेस में भी ऐसे
नेताओं की अब कमी नहीं है जो तीसरे मोर्चे की ओर लुढ़क सकते हैं। हलांकि हिमाचल
में तीसरे मोर्चे के सत्ता में आ जाने की कोई संभवना नहीं है।
कांगड़ा से भाजपा के नेता रमेश धवाला भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं। उनके
साथ कुछ पूर्व मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता भी कुछ इस तरह के संकेत दे रहे
हैं कि वह कोई नई पार्टी भारतीय निर्वाचन आयोग में पंजीकृत करवा सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश में तीसरा मोर्चा बनाने के कई बार प्रयास हुए लेकिन सफल नहीं हो
सके। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हिमाचल में जितने भी नेताओं ने तीसरा मोर्चा
बनाने के प्रयास किए वह उनके निजी स्वार्थों पर टिके हुए थे। स्वार्थपूर्ति न
होने और हार का सामना कर आखिरकार वह नेता अपनी पुरानी पार्टियों में लौट गए। इस
बार भी जिस तीसरे मोर्चें के गठन की बात की जा रही है वह भी पुरानी तरह की ही
मानसिकता से ग्रसित होकर सामने आ रही है।
बगावती तेवर अपनाए हुए यह नेता भी प्रदेश में जाकर वही रोना रो रहे हैं कि उनकी
पार्टी ने उनके साथ अन्याय किया है, जबकि प्रदेश की जनता को इनके रोने धोने से
कोई लेना देना नहीं है। ऐसा पहले भी होता आया है और फिर से वही हो रहा है।
इसलिए तीसरे मोर्चे के नाम से लोग उक्ता चुके हैं। यह नेता इतने विवेकशील भी
नहीं हैं कि नई बातों से प्रदेश की जनता के बीच जाकर कुछ आकर्षण पैदा कर सकें।
इन्होंने हमेशा दूसरों के कंध पर चढ़कर राजनीति की है और अब उन्होंने अपना कंधा
खींच लिया है।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में तीसरे मोर्चे की सख्त
गुंजाइश है, अगर वह नए तेवर, नए क्लेवर और नई युवा शक्ति के साथ मैदान में
उतरता है। कांग्रेस पार्टी में भी परिस्थितियां बहुत अच्छी नहीं हैं। पिछली बार
कुछ कांग्रेस के विधायक बिदककर भाजपा की ओर चले गए थे, लेकिन अब भी कांग्रेस के
भीतर बहुत से नेता हैं जो चाहते हैं कि प्रदेश में कोई नया राजनैतिक विकल्प
बने। यदि आने वाले समय में कांग्रेस से निकलकर कुछ लोग चुनाव से पहले तीसरे
मोर्चे की बात करने लगें तो इसमें किसी को भी हैरानी नहीं होनी चाहिए।
कांग्रेस और भाजपा से बिदकर तीसरा मोर्चा बनाने की बात करने वाले नेताओं की
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह तीसरे मोर्चे की बात सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि
वह तीसरे मोर्चे के दम पर फिर से विधायक बनाना चाहते हैं ताकि वह अपनी पार्टी
में फिर से सौदेबाजी करने लायक बन जाएं। तीसरे मोर्चे की संभावना इस बात पर
परवान चढ़ सकती है कि प्रदेश में कोई नई टीम खड़ी हो और बगावती तेवर दिखाने वाले
कांग्रेसी और भाजपाई उसकी बैक में खड़े हो जाएं। यह बात उतनी ही मुश्किल है जैसे
किसी चींटी के सिर पर ताज पहनाने की बात हो। सिर्फ तीसरे मोर्चे की संभावना को
तभी गंभीरता से लिया जा सकता है जब उसमें ऐसे लोग आए जो प्रदेश की दिशा और दशा
बदलने की सोच रखते हों और उनका कोई स्वार्थ न हो।
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