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संवैधानिक मामलों
में अजीब तरह आचरण करती है सरकार
एनटीटी टीचर भर्ती में फिर फंसी सुक्खू सरकार...
विशेष संवाददाता
शिमला : संवैधानिक मामलों में जयराम ही नहीं सुक्खू सरकार भी अजीब तरह का आचरण
करती है। अब हिमाचल ने नर्सरी और केजी कक्षाओं के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था
देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई) प्रशिक्षकों की भर्ती का भविष्य राज्य मंत्रिमंडल
तय करेगा। हलांकि यह तयबाजी पिछले करीब दो दशकों से प्रदेश में चल रही है। कहते
हैं कि कम समझ रखने वालों की तरह कार्य कर रहे शिक्षा विभाग ने इस पर रिपोर्ट
तैयार कर सरकार को भेजने की तैयारी कर ली है।
अब हैरतअंगेज सुझाव यह दिया गया है कि यदि केंद्र सरकार से दो वर्षीय एनटीटी
(नर्सरी टीचर ट्रेनिंग) डिप्लोमा की अनिवार्यता में तत्काल छूट नहीं मिलती तो
प्रदेश अपने स्तर पर छह माह का ब्रिज कोर्स शुरू कर सकता है। अब इस बात पर हंसा
न जाए तो क्या किया जाए। हिमाचल सरकार इस मामले में उस बात की छूट मांगने जा
रही है जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21ए शिक्षा के अधिकार कानून को संविधान
में शामिल कर किया गया था। भारत के संविधान में यह 86वां संशोधन 2002 में किया
गया था। जिस पर छूट देना केन्द्र सरकार के बस में नहीं है।
शिक्षा विभाग के तथाकथित बुद्धिजीव कह रहे हैं कि उनके सुझाव से पात्रता
प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को अवसर दिया जा सकेगा। इनकी अक्ल यह सोच रही है
कि वह अपना सुझाव केन्द्र सरकार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री के समक्ष रखेंगे और
वह चुटकी में भारत के संविधान के संशोधन को नकारते हुए उन्हें इसकी स्वीकृति
प्रदान कर देंगे। उन्हें इतना भी नहीं मालूम है कि 2002 में संविधान संशोधन के
बाद ही संसद में शिक्षा का अधिकार कानून लगाया गया था और राष्ट्रीय अध्यापक
शिक्षा परिषद (एससीटीई) को दिशानिर्देश दिए गए थे कि वह अब 14 वर्ष तक की आयु
के बच्चों की शिक्षा के लिए मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों को पंजीकृत
करे। जिसके तहत एनटीटी कोर्स के लिए निर्देश दिए गए थे। अब प्रदेश सरकार दो ढ़ाई
दशक से सोई हुई है तो कोई क्या कर सकता है।
पिछले दिनों प्रदेश में एनटीटी टीचर भर्ती के लिए 6,297 पदों पर आवेदन आमंत्रित
किए गए थे। कुल 10 हजार से अधिक उम्मीदवारों ने आवेदन जमा करवाए लेकिन जब
योग्यता की जांच हुई तो केवल 14 उम्मीदवार ही एनसीटीई से मान्यता प्राप्त
संस्थान से दो वर्षीय एनटीटी डिप्लोमा धारक पाए गए। अधिकतर आवेदक निजी या बिना
मान्यता वाले संस्थानों से डिप्लोमा लेकर आए थे, जिन्हें नियमानुसार स्वीकार
नहीं किया जा सकता था। निर्लज्जता से शिक्षा विभाग के अधिकारी अब कह रहे हैं कि
फिलहाल बहुत कम ऐसे संस्थान हैं जिन्हें एनसीटीई से एनटीटी कोर्स चलाने की
मान्यता प्राप्त है। जबकि यही बात शिक्षा विभाग को तीस वर्ष पहले ही प्रदेश
सरकार को बताकर इस विषय के मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थान खुलवाने चाहिए थे।
इतनी नासमझियों के बाद कहा जा रहा है कि इन हालात में राज्य सरकार अब भारत
सरकार से यह आग्रह भी कर सकती है कि दो वर्षीय एनटीटी डिप्लोमा की अनिवार्यता
में कुछ समय के लिए छूट दी जाए ताकि प्रदेश में नई नीति बनने तक भर्ती
प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके और यदि केंद्र से तत्काल राहत नहीं मिलती तो
सरकार राज्य स्तर पर अपनी मन मर्जी से छह माह का ब्रिज कोर्स शुरू करने पर
विचार कर सकती है। अब इन्हें भारत का संविधान कौन पढ़ाएगा, हलांकि यह शिक्षा
विभाग है।
कहा जा रहा है कि इस छमाही कोर्स के जरिए ऐसे उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया
जाएगा जिनके पास स्नातक या शिक्षा में न्यूनतम योग्यता है। यहां शिक्षा विभाग
सरकार को यह भी नहीं बता रहा है कि इस सुझाव की संवैधानिक बाद्यता से सरकार पार
पा लेगी। बेचारे शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर शिक्षा विभाग के सुझाव पर वहीं बता
रहे हैं जो उन्हें सिखाया गया है कि अब या तो केंद्र से छूट लेनी होगी या राज्य
अपने स्तर पर वैकल्पिक प्रशिक्षण प्रणाली विकसित करेगा। हलांकि मंत्री को
संवैधानिक जानकारी होनी चाहिए।
इस घटना के बाद तो कहा जा सकता है कि प्रदेश की सुक्खू सरकार शुरू से ही
संवैधानिक मामलों में अजीब तरह से कार्य कर रही है। इस सरकार का कार्यकाल अब
समाप्ती की ओर है और इस सरकार का गठन भारत के संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) के
तहत अभी तक नहीं हो पाया है। अभी तक प्रदेश सरकार में 12 मंत्री नहीं बनाए गए
हैं जो एक संवैधानिक बाद्यता है। यही नहीं जिस दिन प्रदेश में प्रदेश सरकार के
मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू ने शपथ ली थी तो उसमें उनके साथ एक मात्र
मंत्री था, जो पूरी तरह से असंवैधानिक कार्य था। इसी तरह असंवैधानिक कार्य के
साथ सरकार के चलने की झड़ी लगी पड़ी है।
सुक्खू सरकार ही नहीं पूर्व जयराम सरकार भी एनटीटी मामले में चार हजार भर्तियों
का रोना रोती रही पर किया कुछ भी नहीं। यदि पूर्व सरकार या अब सुक्खू की सरकार
ने अपनी सरकार की ओर से भी एनसीटीई की गाइड लाइनस पर दो वर्षीय मान्यता प्राप्त
डिप्लोमे के कोर्स शुरू करवा दिए होते तो आज मौजूदा सरकार को भी एनटीटी टीचर की
भर्ती के लिए छक्के-पंजे नहीं करने पड़ते और प्रदेश में अपने संस्थानों से
मान्यता प्राप्त डिप्लोमा प्राप्त टीचरों की धड़ाधड़ भर्ती हो जाती। यही नहीं
सरकार को अभी तक यह अक्ल नहीं आई है कि वह दो वर्षीय एनटीटी डिप्लोमें के
संस्थान खोल दे तो दो वर्ष बाद यह सारी समस्या स्वयं हल हो जाएगी।
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