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हिमाचल समाचार

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नालागढ़ में सही एंबुलेंस सेवा न होने पर भड़की वकील

उन्‍होंने तड़पते हुए अपने पिता को चंढ़ीगढ़ पहुंचाया...

निजी संवाददाता

     शिमला : नालागढ़ की वकील निशा तलवार सरकारी अस्पताल की एंबुलेंस सेवा के खिलाफ भड़क गई हैं। एम्बुलेंस में मरीज को चंडीगढ़ रेफर कर दिया जाता है उसमें मरीज को सांस लेने में जब बहुत ज्यादा तकलीफ हुई तो एंबुलेंस में बैठे कर्मचारी से सिलेंडर की मांग की गई तो उन्होंने कहा कि सिलेंडर खत्म है, उपलब्ध नहीं है। मरीज की सांसे अटक रही थी, वो तड़पते रहे थे पर एंबुलेंस में कोई सुविधा ही नहीं थी।
     नालागढ़ की वकील निशा तलवार ने आगे बताया कि ये मरीज और कोई नहीं मेरे पिता थे, कितनी मुश्किलों को झेलते हुए उन्हें चंडीगढ़ पहुंचाया गया, इतनी बड़ी लापरवाही की वजह से किसी की जान भी जा सकती थी, सरकार कोई सुविधा नहीं दे रही है। गुस्से में निशा यहां तक कहती हैं कि बस वोट मांगने हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं लेकिन काम करने के नाम पर वोट ले जाते हैं।
     वकील निशा आगे कहती हैं कि नेता लोग कहते है हमें तो जनता की सेवा करनी और ऐसी लचर सुविधाएं देकर तो आप आम जनता को परेशानी में ही डाल रहे हैं। एक अस्पताल भी ढंग से नहीं चला सकते हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्रालय की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं है कि सरकारी अस्पतालों में एडवांस टेक्नोलॉजी की एंबुलेंस की सुविधा दी जाएं। क्यों बद्दी, बारोटीवाला और नालागढ़ के लोगो को चंडीगढ़ इलाज के लिए भागना पड़ता है। वह सरकार से सवाल करती हैं कि आपने इतने साल में किया क्या है ? बस पैसों की राजनीति कि 1500 रुपए खाते में डाले जाएंगे बस यही कर सकते हो आप। राजनीति में राज करना है तो स्मार्ट हॉस्पिटल, स्कूल कॉलेज की शिक्षा पर काम कीजिए जोकि एक आम इंसान की जरूरतें हैं। जनता का भरोसा जीतना वह भी लालच देकर क्या यही है आज की राजनीति। वह युवाओं को सलाह देती हैं कि वोट डालना बंद कर दो, उन सभी नेताओं को जो पैसों की राजनीति करते हैं। नए युवा लोग राजनीति में आएं और हिमाचल का विकास और उन्नति पर काम करें।
     एक वकील की इस व्यथा को जानने के बाद जिला प्रशासन नालागढ़ को कम से कम यह बात तो सुनिश्चित करनी चाहिए कि नालागढ़ अस्पताल में एंबुलेंस की मजबूत सुविधा प्रदान करे ताकि लोग चंडीगढ़ जाकर अपना इलाज तो करवा सकें। नालागढ़ के समाजसेवियों को भी चाहिए कि वह अपने स्तर पर एंबुलेंस सुविधाओं को सही करने की दिशा में काम करें।

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छात्रवृति घोटाले में मामला कुर्क तक पहुंचा

मां सरस्‍वती एजुकेशनल ट्रस्‍ट की संपत्ति कुर्क...

निजी संवाददाता

     शिमला : हिमाचल प्रदेश में हुए छात्रवृति घोटाले पर अब गुनहगारों की संपत्ति कुर्क होने के अंजाम तक पहुंच गई है। कुछ वर्ष पहले प्रदेश में छात्रवृति घोटालें की गूंज ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया था। जालसाजी करके छात्रों को मिलने वाली छात्रवृति को कुछ संस्थानों ने डकार लिया था। छात्र इस छात्रवृति के न मिलने से अपनी फीस तक जमा नहीं कर पाए थे और कई परेशानियां उन्होंने झेली।
     छात्रों की दुर्दशा की कहानियां तब अखबारों में भी छपी थी। कुछ छात्र जो प्रदेश से बाहर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे उन्हें अपनी पढ़ाई और हॉस्टल तक छोड़ने के लिए मजबूर होना पढ़ा था। अब जांच अपने अंतिम दौर में पहुंच रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) शिमला ने हिमाचल प्रदेश छात्रवृत्ति घोटाले के मामले में धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के प्रावधानों के तहत 18.27 करोड़ रुपए मूल्य की पांच अचल संपत्तियों को अंतिम रूप से कुर्क कर लिया है। इन संपत्तियों में लगभग 125 बीघा की तीन जमीनें शामिल हैं। ये जमीनें मां सरस्वती एजुकेशनल ट्रस्ट के नाम पर पंजीकृत हैं, जो नाहन (सिरमौर) में स्थित हैं।
     इसके अलावा दो अन्य संपत्तियों में पंचकूला, हरियाणा में स्थित दो फ्लैट प्रीति बंसल और ऋचा बंसल के नाम पर पंजीकृत हैं, जो मां सरस्वती एजुकेशनल ट्रस्ट में ट्रस्टी हैं। मां सरस्वती 18.27 करोड़ की संपत्ति भी इसी दायरे में आ गई है।

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ट्रंप के कहर की छाया हिमाचल प्रदेश के सेब तक पहुंची

सेब के दाम सही मिलेंगे या नहीं, चिंता में बागवान...

निजी संवाददाता

     शिमला : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कहर की छाया हिमाचल के सेब उत्पादकों पर भी पड़ने लगी है। यदि सरकार ने ट्रंप के दबाव में सेब पर भी आयात शुल्क कम करवा दिया तो हिमाचल के सेब उत्पादकों को भारी नुक्सान उठाना पड़ सकता है। हिमाचल के सेब उत्पादक चाहते हैं कि विदेशी सेब पर आयात शुल्क को बढ़ाया जाए ताकि वह भारत में महंगा हो जाए। अमेरिका के साथ चल रहे टैरिफ वार के कारण सेब उत्पादक घबराए हुए हैं।
     सेब बागवानों कहते हैं कि अमेरिकी सेबों पर मौजूदा 50 प्रतिशत शुल्क को बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने के बजाय भारत इसे और कम करने के लिए मजबूर हो सकता है। संभवतः इसे 50 प्रतिशत से नीचे ला सकता है। अगर ऐसा हुआ तो इस कदम से हिमाचल प्रदेश के सेब बागबानों को गंभीर वित्तीय झटका लगेगा और सेब से होने वाला मुनाफा बहुत कम हो जाएगा।
     पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के काल में भारत ने 50 प्रतिशत आयात शुल्क को बढ़ाकर 70 फीसदी किया था। इसका प्रभाव यह हुआ कि अमेरिका में सेब के आयात में 19 गुना वृद्धि हुई जो केवल 4,496 मीट्रिक टन से बढ़कर 1.75 लाख मीट्रिक टन हो गई। इस वृद्धि ने स्थानीय सेब उत्पादकों के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी, जिससे पिछले सीजन के दौरान उन्हें काफी नुकसान हुआ। ऐतिहासिक रूप से उच्च टैरिफ ने आयात को सीमित करने में मदद की है। 2019 में जब भारत ने ट्रंप के स्टील टैरिफ के जवाब में अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 50 से बढ़ाकर 70 फीसदी कर दिया तो आयात 1.2 लाख मीट्रिक टन से घटकर सिर्फ 4,496 मीट्रिक टन रह गया।
     बदले परिवेश में भारत सरकार अमेरिकी सेब, बादाम और अखरोट पर आयात शुल्क कम करने के लिए मजबूर हो सकती है। यदि यह निर्णय लागू किया जाता है तो घरेलू बाजार में सस्ते अमेरिकी सेबों की बाढ़ आ जाएगी। वर्ष 2023 में सेब पर आयात शुल्क 70 फीसदी था जिसे घटाकर 50 प्रतिशत किया गया था इससे भी हिमाचल के सेब को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। हिमाचल के बागवान अपनी इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार से संपर्क साध रहे हैं पर समाधान बहुत मुश्किल है।

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शराब के ठेकों की नीलामी

निजी संवाददाता

     शिमला : हिमाचल में शराब के ठेके नीलाम होने जा रहे हैं। राज्य सरकार की मंजूरी के बाद आबकारी कराधान विभाग ने पालिसी को अंतिम रूप दे दिया है। शराब के ठेकों की नीलामी से राज्य सरकार को इस बार करीब 150 करोड़ रुपए का मुनाफा होने की संभावना जताई जा रही है।
     बीते वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार की मंजूरी से आबकारी कराधान विभाग ने शराब के ठेकों की नीलामी से 2700 करोड़ रुपए के राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य तय किया था, जबकि इस बार इस लक्ष्य को बढ़ाकर 2850 करोड़ रुपए कर दिया गया है। आबकारी कराधान विभाग ठेकों की नीलामी पहले से शुरू कर देगा और पहली अप्रैल से नए आदेश लागू हो जाएंगे। आबकारी कराधान विभाग ने इस बार पालिसी में शराब तस्करी पर नकेल कसने के कई पैमाने तय किए हैं।

 
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