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प्रदेशाध्‍यक्षों की राजनीति में कोई दम नहीं रह गया है

देखना है किस पार्टी में कौन बनता है प्रदेशाध्‍यक्ष...

विशेष संवाददाता

     शिमला : अब राजनीति में पार्टी के अध्यक्षों की राजनीति में कोई दम नहीं रह गया है। जब राष्ट्र स्तर पर कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्षों की राजनीति ही तोता-मैना जैसी हो गई है तो फिर प्रदेशाध्यक्षों की क्या राजनैतिक बिसात रह गई है, यह पूरा देश जानता है। हलांकि अब भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन भी इसी माह हो जाएगा और कांग्रेस में जिला और प्रदेश अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया चल रही है। लोगों की आंख में धूल झोंकने के लिए पार्टी के चुनाव करने की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक कहा जाता है। लेकिन यह चुनाव लोकतंत्र से कोसों दूर होते हैं।
     क्या कोई यह मान सकता है कि कांग्रेस में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिका अर्जुन खड़गे में इतना दम है कि वह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के फैसले के खिलाफ जाकर संगठन में कोई निर्णय ले सकें। लगभग सभी लोग यही कहेंगे कि नहीं ऐसा नहीं हो सकता है। बात भाजपा की हो जाए तो वहां तो मोदी-शाह के सामने किसी भी राष्ट्रीय अध्यक्ष की जुबान खुल जाए, ऐसी संभावना भी नहीं है। हलांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब चाहता है कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष ऐसा होना चाहिए जो संगठन को सरकार से ऊपर रख सके। इस बात का पता तब चलेगा जब इसी महीने भाजपा के नए अध्यक्ष का चुनाव हो जाएगा।
     फिलहाल हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा अभी अपने प्रांतीय अध्यक्षों को बनाने की जुगत में भिड़ी हुई हैं। दोनों पार्टियों में जिला अध्यक्ष बनाए जाने की प्रक्रिया लगभग अंतिम दौर में चल रही है। इसके बाद दोनों पार्टियां अपने प्रदेशाध्यक्ष का चुनाव करेंगी। देखना यह है कि भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष राजीव बिंदल फिर से प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बन पाएंगे यह उनके स्थान पर फिर से सुरेश कश्यप को प्रदेशाध्यक्ष बना दिया जाएगा। कांग्रेस में श्रीमति प्रतिभा सिंह को बदले जाने के कयास लगाए जा रहे हैं। कांग्रेस ने उनको बदले जाने के संकेत देते हुए अर्की के विधायक संजय अवस्थी को कार्यकारी अध्यक्ष पहले ही नियुक्त कर लिया है। राजनैतिक हालत तो यही कहते हैं कि श्रीमति प्रतिभा सिंह को फिर से प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना कांग्रेस की मजबूरी बन गई है।
     अब प्रदेश सरकार का कार्यकाल भी लगभग आधा होने वाला है और तीसरे साल में दोनों पार्टियों को अपनी अपनी राजनैतिक टीम तैयार करनी है जो 2027 का विधानसभा चुनाव पार्टी को लड़वा सके। कहा तो यह भी जाता है कि प्रदेशाध्यक्ष के लिए पार्टियों में सिफुटव्वल की नौबत इसलिए आ जाती है कि वह प्रदेश में टिकट आबंटन में मुख्य भूमिका निभाता है। पर अब यह बातें पुरानी हो चली हैं। अब तो राष्ट्रीय स्तर पर जिसकी तूती बोलती है वह विधानसभा का टिकट झटक कर ले आता है। पार्टी हाई कमान पहले से ही तय कर देती है कि किसी मुख्यमंत्री बनाना है और किस नेता के कितने लोगों को टिकट देना है। इस परंपरा के चलते अब पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष होना कोई मायने नहीं रखता है। यह चुनाव मात्र लोगों को यह दिखाने के लिए हैं कि वह बहुत बड़े लोकतंत्र के उपासक हैं।
     प्रदेश में सरकार कांग्रेस की बने या भाजपा की मुख्यमंत्री पद पर जो बैठ जाता है वह पार्टी के संगठन को दबोच लेता है। यही नहीं जो पार्टी प्रदेश की सत्ता में विराजमान होती है वह संगठन की परवाह किए बिना अपने चहेतों के दम पर चलती है। यही कारण है कि प्रदेश में सरकार किसी की भी बने मुख्यमंत्री और प्रदेशाध्यक्ष में छत्तीस का आंकड़ा ही रहता है। दोनों का प्रयास रहता है कि सरकार में उन्हीं के लोगों को अधिक से अधिक लाभ मिलता रहे। यह कारण है कि राजनैतिक दलों में गुटबाजी हमेशा जिंदा रहती है।

 
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