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मीडिया वालों ने दो कोड़ी का नहीं छोड़ा भारत को

डोनाल्‍ड ट्रंप वहीं कर रहे हैं जो उनका देश चाहता है ...

विशेष संवाददाता

     आज के मीडिया ने भारत वर्ष को विश्व मान चित्र में दो कोड़ी का नहीं छोड़ा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस प्रकार भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पहले अपने शपथ ग्रहण समारोह में नहीं बुलाया और अब अमेरिका दौरे से प्रधानमंत्री से अपने पक्ष में समझौते करवाकर वापस भेज दिया। यह भारत के लिए चिंता की बात है। इसके लिए मीडिया सबसे बड़ा जिम्मेदार है कि मीडिया ही देशवासियों को यह सूचना दे रहा था कि मोदी का डंका अमेरिका में भी बज रहा है और ट्रंप मोदी के परम मित्र हैं। अब जो व्यवहार भारत के साथ अमेरिका ने किया है उससे भारत की इज्जत दुनियां भी में दो कोड़ी की नहीं रह गई है। अमेरिका भारतीयों को वहां से निकाल रहा है।
     जहां तक भारत के अमेरिका के साथ संबंध रहे हैं वह बनते बिगड़ते रहे हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है कि अमेरिका भारत से नारज है। बांग्ला देश को लेकर पाकिस्तान के युद्ध के समय भी भारत अमेरिका के संबंध खराब हो गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब अमेरिका गई थी तो वहां उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को यहां तक कह दिया था ‘यू डोनट नो एनिथिंग मिस्टर निक्सन’, वह अमेरिका से अपने कार्यक्रम को छोड़कर भारत भी लौट आई थीं। लेकिन इसके बाद भी अमेरिका ने कोई ऐसा कदम भारत की शान के खिलाफ नहीं उठाया। बल्कि दोनों देशों ने अपने संबंध अच्छे करने की ओर हाथ बढ़ाया और संबंध फिर से अच्छे हो गए थे। लेकिन अब अमेरिका भारत को वह समझौते करने के लिए बाद्य कर रहा है जो भारत के हित में नहीं हैं और प्रधानमंत्री उसके बारे में कुछ बोल भी नहीं पा रहे हैं।
     डोनाल्ड ट्रंग ने जो झटका भारत को न बुलाकर दिया है। यह बात बहुत दूर तलक जाएगी। यह बात भी सभी जानते हैं कि मोदी मोदी हैं, इंदिरा गांधी नहीं हैं। मोदी ने जो संबंध अमेरिका से बनाए उसी का यह भुगतान है कि अमेरिका की नजर में भारत कुछ भी नहीं है। इसमें जहां मोदी की दर्जनों गलतियां हैं वहीं बहुत बड़ी गलती भारतीय मीडिया की भी है। उसने मोदी की हर जगह रिश्ता बनाने वाली आदत की आलोचना नहीं की बल्कि उसे और काल्पनिक हवा दी। भारत के लोगों को गुमराह किया कि मोदी और ट्रंप में तो जबरदस्त नजदीकियां हैं।
     अब जब इन काल्पनिक संबंधों की हवा निकल गई है और ट्रंप मोदी के संबध दूरियों में बदल रहे हैं तो भी भारतीय मीडिया इसका विश्लेषण भी सही से नहीं कर पा रहा है। वह यह बताने में पूरी तरह नाकामयाब रहा है कि अमेरिका के नागरिक अपने नेताओं को किस रूप में देखना चाहते हैं और ट्रंप वही कर रहे हैं जो उसके देश के नागरिक चाहते हैं। अमेरिका के लोकतंत्र में नागरिक को सबसे ऊंचे दर्जे में रखा जाता है और भारतीय लोकतंत्र में ठीक इसके विपरीत हो रहा है। तभी शायद अमेरिका के लोग भारत में रहने वाले लोगों को पसंद नहीं कर रहे हैं। यदि भारतीय मीडिया ने लोकतंत्र की पूरी ताकत से रक्षा की होती तो शायद ट्रंप भारत के साथ नहीं करते जैसा वह कर रहे हैं।
     भारत वर्ष का यह वैभव रहा है जब अमेरिका और रूस जैसे शक्तिशाली देश उसे अपने पक्ष में रखना चाहते थे। आज अमेरिका ने अपना हाथ झटक लिया है और रूस कब भारत को झटका देगा कहा नहीं जा सकता है। भारत के मीडिया ने यदि भारत की सही लोकतांत्रिक तस्वीर दुनियां के सामने नहीं रखी तो अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की क्या औकात रह जाएगी, इसका सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है।
     अमेरिका ने अपने मंसूबे स्पष्ट कर दिए हैं और इसे एक शुरुआत माना जा सकता है। अब इन हालातों में अमेरिका में चल रहे मोदी के परम मित्र गौतम अडाणी के साथ अमेरिका किस तरह पेश आएगा इसका भी अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है। भारत में फैली ट्रंप की मदद अडाणी को मिलने की बातें तो अब फुर्र हो चुकी हैं।

 
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