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चुनाव आयोग पर आरोप

विशेष संवाददाता

     शिमला : दिल्ली में भी चुनाव आयोग पर धांधली से भाजपा को चुनाव जिताने का कथित आरोप लगा दिया गया है। आरोप यह है कि बहुत से विधानसभा क्षेत्रों में विभिन्न पतों पर जाली वोट बनाने के लिए आवेदन दिए गए थे। इस पर चुनाव आयोग क्या संतोषजनक सफाई देता है इसकी प्रतीक्षा की जा रही है।
     आम आदमी पार्टी (आप) के नेता संजय सिंह ने एक लंबी चैड़ी सूचि जारी की है जिसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि जाली वोटों के सहारे भाजपा ने दिल्ली में वह जीत हासिल कर ली है जो उसे नहीं मिल सकती थी। उन्होंने कहा है कि भाजपा सांसदों, सरकारी क्वार्टरों और दुकानों तक में जाली वोट बनाने के लिए आवेदन दिए गए थे। इस प्रकार की आशंका चुनावों से पहले ‘आप’ के शीर्ष नेताओं ने चुनाव आयोग से कर दी थी लेकिन इस पर कोई संज्ञान चुनाव आयोग ने नहीं लिया और इसका परिणाम पूरे देश के सामने है।
     अब देखना यह है कि ‘आप’ के नेता चुनावों को लेकर जो आरोप चुनाव आयोग पर लगा रहे हैं वह इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे या नहीं। पिछले लोकसभा चुनावों के बाद दिल्ली में वोट बनवाने की बाढ़ सी आ गई थी। सांसदों को अलॉट रिहायश पर भी 20-30 वोट बनाने का अर्थ यह है कि वहां 20-30 लोग कम से कम छह महीने से रह रहे हैं। इसी तरह सरकारी क्वार्टर जो किसी कर्मचारी को सरकार द्वारा अलॉट किया गया है वहां कोई जरूरत से ज्यादा वोट बनवाने के लिए आवेदन कैसे कर सकता है। इसी तरह दुकानें जो रात को बंद हो जाती हैं वहां कोई वोट कैसे बनवा सकता है। इसी तरह के आरोप ‘आप’ के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से लगाने शुरू कर दिए हैं।
     हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह वोट कटवाने और जाली वोट बनवाने के आरोप चुनाव आयोग पर दिल्ली में भी लगा दिए गए हैं। ‘आप’ के नेताओं का आरोप कुल मिलाकर यही है कि उनकी पार्टी चुनाव हारी नहीं बल्कि उसे जबरन हरवा दिया गया है। अब उनके पास यही चारा है कि वह हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह इस लड़ाई को चुनाव आयोग और कोर्ट में लड़ते रहें और जो सरकार बन गई है वह नापाक सरकार की तरह कार्य को अंजाम देती रहे। यदि उनके पक्ष में फैसला आ भी जाए तो वह इतने समय बाद आए कि उसके कोई मायने ही न रह जाएं।
     यहां सवाल यह उठता है कि हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में चुनाव आयोग पर आरोप प्रत्यारोप के बीच सरकारों का गठन तो हो गया है, पर क्या इन्हीं आरोपों प्रत्यारोपों के बीच ही अब देश भर में इसी प्रकार चुनाव होते रहेंगे। इसके बाद बिहार और उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होने वाले हैं और यदि भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए यह रणनीति अपना ली है तो यह कार्य तो बिहार और उत्तर प्रदेश में भी शुरू हो चुका होगा। यदि मतदाता सूची ही पूरी तरह जाली बना ली जाए तो देश में लोकतंत्र कैसे बचेगा।
     यदि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप सच्चे हैं तो यह एक गंभीर संवैधानिक संकट है। क्योंकि भारतीय चुनाव आयोग का गठन भी उसी संविधान की ताकत पर हुआ है जिस संविधान की ताकत पर सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, संसद और संवैधानिक हाउस बनें हैं। ऐसे में इनके खिलाफ इन्हीं के पास शिकायत करने के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। यदि सरकार के प्रभाव में चुनावों में हेराफेरी की जा रही है तो सरकार को बदलने के लिए भी तो चुनावों का सहारा ही लिया जा सकता है और चुनाव आयोग ही देश में चुनाव करवा सकता है। कुल मिलाकर स्थिति यह बन गई है कि जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के गलत फैसले को देश को मानना पड़ता है उसी प्रकार चुनाव आयोग के गलत फैसले को भी सभी को मानना पड़ेगा। शायद हमारा लोकतंत्र यहीं आकर फंस गया है।

 
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